मूल्यवान समय, शरीर व्यर्थकिया बदलते रिश्तेनातों में,
नही आना था, आ गया पागल चिकनी चुपडीÞ बातों मे,
चोट लग ही जाती हैं, प्रीत काँचकी दुनिया से लगाने में,
कचोटता है घाव फिर हरदम अन्दर काली घनी रातोंँ मे
– इन्दु तोदी

२६ बिहिबार , चैत्र २०८२|१८ घण्टा अगाडि
मूल्यवान समय, शरीर व्यर्थकिया बदलते रिश्तेनातों में,
नही आना था, आ गया पागल चिकनी चुपडीÞ बातों मे,
चोट लग ही जाती हैं, प्रीत काँचकी दुनिया से लगाने में,
कचोटता है घाव फिर हरदम अन्दर काली घनी रातोंँ मे
– इन्दु तोदी